Monday, June 14, 2010

इस जाविये से देखो तो जमींदार हम भी है/

''खामोश मिजाजगी तुम्हे जीने नहीं देगी इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो'' शायर की ये पंक्तियाँ भोपाल गैस काण्ड पीड़ितों के लिए सीख का सबब बन गयी है/ ये पंक्तियाँ शायद ये भी कह रही है के बस अब हम चुप नहीं रहने वाले, अपने उपर हुए हादसे का पूरा हक़ अब हम लेके ही रहेंगे चाहे इसके लिए किसी भी रह से गुजरना पड़े / इसकी रह में आने वाला कोई भी कानून,मंत्री या सशक्त देश का व्यक्ति ही क्यों न हों/
भोपाल गैस काण्ड पर मचा कोहराम दिन पर दिन पेचीदा होता जा रहा है कारण है रोज होने वाले ''खुलासें व राजनेताओं की बयानबाजी जो मामले को राजनीतिक मोड़ देने पर अमादा है और मसलें का निपटारा निकालने के बारें में कोई सोच भी नहीं रहा है / इलेक्ट्रोनिक मीडिया जहा पल पल की ख़बरों को उजागर करके विषय पर पकड़ बनाय रखें है वही दूसरी ओर प्रिंट मीडिया ने ख़बरों का ठोंस चिठ्ठा भी तैयार करके लोगो के सामने रखा है ताकि लोग जान सकें की किस तरह खेला जा रहा है विश्व की सबसे बड़ी औधोगिक घटना पर राजनीतिक खेल जिससे उन लोगो की भावनावों को भी पैरों तलें कुचला जा रहा है जिन्हें गले लगाकर सब्र करने की हिदायत देनी चाहिए/
२-३ दिसंबर 1984 की रात को हुए इस हादसे ने 15724 लोगो की जान ली यूसीआईएल नाम की इस कंपनी में गैस के रिसाव हो जाने से यह हादसा हुआ जिसके जिम्मेदार रहे वो लोग जो इस कंपनी में ऊंचे पद पर थे , यही नहीं अमेरिका स्थित इसकी मुख्य शाखा यूसीसी के मालिक वारेन एंडरसन को भी दोषियों की जमात में डाला गया जिसे भारत से अमेरिका भगाने का आरोप मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर मढ़ा जा रहा है
अब लोगो को यह समझ लेना चाहिए की जनता का गुस्सा जब कानून को टक्कर दे गया जो इन्साफ में लापरवाही करने में आगे आया और यही जनता के कोहराम का ही नतीजा रहा के देश के साफ़-सुथरे प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी पर भी उंगलिया उठीं,
कौन कहता है के दफनाने के बाद जलाया नहीं जाता? भोपाल के लोगो के साथ बिलकुल ऐसा ही हो रहा है पहले तो उनको १९८४ में दफनाया गया और अब फैसले के बाद जलाया जा रहा है/ आरोप-प्रत्यारोप की आग में आवाम जल रही है , नैतिकता की बात करने वाले लोग केवल स्वार्थ के लिए ही आगे आ रहें है और लोकतंत्र की राग गाने वाले राजनेता ये भूल गए की केवल वही नहीं जो इस देश में रहते है हम भी इस देश के जमीदार है यकीन नहीं तो किसी भी कब्रिस्तान में जा कर देखें जहा दो गज जमीन के मालिक हम भी है जो नसीब होगी मरने के बाद, इस जाविये से देखो तो जमीदार हम भी है/ भोपाल के लोग पैदा हुए है लोकतंत्र में जीने के लिए वो प्रजातंत्र में क्यों मरें ? हक़ और हलाल की लडाई में पूरा देश भोपाल के उन पीड़ित लोगो के साथ है जो हादसे का इन्साफ पाना चाहते है यह लडाई भले ही कितनी लम्बी क्यों न हो लेकिन हक़ पूरा मिलना चाहिए वरना लोकतंत्र में रहने का कोई मतलब नहीं/

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