Tuesday, June 29, 2010

बेबसी के चूल्हें में सेंकती है गरीबी की रोटियाँ

देश में पेट्रोल,डीजल,कैरोसीन व रसोई गैस के दाम क्या बढे भारत के समस्त छोटे बड़े राज्यों में महंगाई का बिगुल बज गया/ कोई मोटर गाडी की अर्थी निकाल रहा है तो कोई खुद जिन्दा रहते हुए भी अर्थी की सेज पर लेट कर महगाई का प्रदर्शन कर रहा है कही भैस को खड़ा करके उसके सामने बीन बजाई जा रही है तो कही नेताओ के पुतले भी खुलेआम फूके जा रहे है जिस तरह केंद्र ने कलात्मक रूप से महंगाई बढाई है उसी कला से जनता महंगाई को कम करने की नसीयत दे रही है, दूसरी तरफ वो राजनेता भी इसके लिए केंद्र को कोस रहे है जो सत्ता से बाहर है जिन्हें हमेशा ऐसे ही मुद्दे की तलाश रहती है जहा लोगो के हितैषी बनकर केवल अपना उल्लू सीधा करना होता है/
महगाई पहले ही जीविका के लिए अवरोधक थी फिर से इस महंगाई को ज्यादा प्रभावी बनाने के पीछे सरकार का क्या औचित्य है? यह अहम् बहस का मुद्दा है/ जब एक लीटर पेट्रोल पर ५१.३ फीसद, डीजल पर ३१.८ फीसद तथा कैरोसीन पर ५ फीसद का मुनाफ़ा राजस्व कमा रही थी तो अब इन तीनो पेट्रोलियम पदार्थ की दरों में क्रमश: ३.५० रुपये, २ रुपये, व ३ रुपये की बढौतरी आखिर क्यों? इसका जवाब देश जानना चाहता है/ वही सार्वजनिक तेल कंपनिया जब करोड़ों कमाकर फायदे में चल रही थी तो उनको और फायदा क्यों पहुचाया जा रहा है क्या सरकार को बनानें वालें ये पूंजीपति है या सरकार ये समझती है कि जनता का अधिकार केवल वोट देना और सरकारी नीतियों का पालन करना मात्र है किसी भी हस्तछेप के लिए वह अधिकृत्य नहीं/
ऐसी स्थिति में भारतीय फिल्म का वो पुराना गीत याद आता है जिसके बोल कुछ यूँ है कि गैरों पे करम, अपनों पे सितम, ए जानेवफ़ा ये जुल्म न कर / ऐसी गलाघोंट नीति से इस बात का भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज पूंजीपतियों का बोलबाला है नागरिकों के मौलिक अधिकारों का परोछ हनन किया जा रहा है जब इसके लिए कोई व्यक्ति आवाज उठाता है तो उसे सरकारी नीतियों की आलोचना करने पर दंडात्मक कार्रवाई करने के संकेत भी मिल जाते है/
केंद्र सरकार के इस फैसले से भले ही पार्टी के लोग व पूंजीपति खुश हो लेकिन देश की आश्रित जनता तो बदहाली के आंसू बहा रही है, ये बताना जरूरी नहीं के कहा आंसू बहा रही है बल्कि ये देखना जरूरी है कि कहा आंसू नहीं बहा रही/ जो लोग सरकार के द्वारा बढाई इस महंगाई के पछधर है उन लोक्गो को देश के उन जनपदों में भ्रमण करना चाहिए जहा नहरें सूखी पड़ी है टुयुब्वेल डीजल कि महंगाई के कारण बंद है जिससे ग्रामीण वर्ग हताश हो चुका है केवल खेत ही रह गए है उनमे उगने वाला कम आनाज आज भी महंगाई को ही तोहमत दे रहा है/ इससे ग्रामीण इलाको की दुर्दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है कि खेती के लिए मशीनी संसाधन तो बहुत है लेकिन उन मशीनी संसाधनों में पड़ने वाला पेट्रोलियम पदार्थ हद से ज्यादा महंगा है जिसके चलते किसान वर्ग अपना दामन खीच लेता है क्या सरकार को इस बात की जानकारी नहीं है या वह जान कर भी अनजान बनना चाहती है?
यही नहीं उन शहरी इलाकों में जाये जहा लोग यह कहते नजर आते है कि इस सवारी से अच्छा है कि मैं पैदल हो जाऊ।/ उन घरों की भी अपनी ही कहानी है जहा कैरोसीन तेल खरीदने के पैसे नहीं मिटटी के चूल्हें ही मात्र है जहा बेबसी के चूल्हें में सेंकती है गरीबी की रोटियाँ। ये रोटियाँ आज से नहीं है इनका नाता तो कई सदियों से चला आ रहा है सवाल यहाँ ये भी उठता है कि आखिर कबतक ऐसे ही सेंकती रहेंगी ये बेबसी कि रोटियाँ? सत्ता में बैठे ने अपना कद इतना ऊंचा बना लिया है कि समस्त जनता उनके सम्मुख चीटी कि तरह हो गयी है जिसकी आवाज सत्ताधारियों तक पहुच ही नहीं पाती तभी तो जनता के दुःख न तो उन्हें दिखाई देतें है और न ही उनकी पीड़ा को वे महसूस कर सकते है/-- Imran khan
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